अनलॉकडाउन कविता: मैं कई महीनों से अपने घर में…

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मैं कई महीनों से अपने घर में

नजरबन्द हूँ

घर के भीतर डर है

बाहर भी कम खौफ़ नही

 

घर से बाहर निकलूंगा तो

सिपाही धमकी देते हुए कहेंगे

घर के भीतर रहो , अभी तुम्हारी

सजा पूरी नही हुई है

 

मुझे ऐसे गुनाह के लिए सजायाफ्ता

बनाया गया है , जिसे मैंने किया

ही नही

 

बाहर की दुनिया देखे हुए बहुत

दिन हो गए हैं

घर के भीतर की चींजे देखते

हुए मन ऊब सा गया है

उनमें कोई आकर्षण नही

बचा है

 

अपनी बालकनी से पड़ोस के

लोगो को देखता हूँ , वे मुझसे भी

ज्यादा डरे हुए है

 

इच्छा होती है कि सारी बन्दिशें

तोड़ कर अपनी आजादी का एलान

कर दूं

लेकिन तभी ख्याल आता है कि

अगर गिरफ्तार हो गया तो सजा

दुगुनी कर दी जाएगी ।

 

@  स्वप्निल श्रीवास्तव

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