उपन्यास अंश: जब हिसाब मांगती जिंदगी

Novel excerpt: When life demands accounting

(अब्दुलाह खान का उपन्यास पटना ब्लूज’ आम आदमी के जीवन में हर रोज उठने वाले सवालों का दस्तावेज हैं. इसमें इसांनियत की खुशबू है औऱ मुसीबतों से लड़ने का जज्बा हैं. प्रकाशक है मजुंल पब्लिशिंग हाउस, और कीमत हैं 250 रूपये. एक अंश:)

एक हफ्ते के अन्दर आरिफ और जाकिंर ने किस्मत से समझौता कर लिया औऱ नाजनीन की शादी में जी-जान से जुट गए. आरिफ को अचानक बरसों पहले नगमा, जो जबलपुर की सबसे खूबसूरत लड़की थी, की शादी की याद आयी.

नगमा की शादी एक अधेड़ उम्र के आदमी के साथ हो रही थी. आरिफ ने उस वक्त कहा था कि नगमा के भाइयों को शर्म से पानी में डूब मरना चाहिए था कि वे कैसे इस बुड्ढे के साथ जिंदगी भर के लिए बांधने जा रहे हैं.

मैं उसकी भाई की जगह होता तो ऐसा कभी भी होने नहीं देता. और जब नाजनीन की शादी हो रही थी तो वह कुछ भी नहीं कर पा रहा था. उसे अपने कहे गए शब्द लौट-लौट कर उसे बिच्छू की तरह डंक मार रहे थे.

नीजनीन के निकाह से तीन दिन पहले कमांडेंट ऑफिस से मकान खाली करने का नोटिस आया. अब्बा को रिटायर हुए एक साल से ज्यादा हो चुका था. नियम के अनुसार छ: महिने से ज्यादा सरकारी क्वार्टर में नहीं रह सकते हैं.

इससे पहले भी कई नोटिस आ चुके थे. हालाकिं इस नियम को बहुत से लोग नहीं मानते थे. अब बब्बन यादव को देख लिजिए. उनको रिटायर हुए तीन साल हो गए थे, लेकिन मजाल है कि उसे कोई नोटिस भेज दें.

वैसे उसकी बात कुछ अलग ही थी, उसका मुख्यमंत्री के आवास आना-जाना लगा रहता था. दूसरे थे राजनाथ सिंह, जिनका ट्रांसफर मुगेंर हो चुका था, लेकिन डेढ़ साल से सरकारी मकान में डटे हुए थे.

अब्बा का मुख्यमंत्री के साथ कोई लेना-देना नहीं था. इसलिए वह कमांडेंट ऑफिस गए औऱ उनसे गुजारिश की नाजनीन की शादी तक उन्हें सरकारी मकान में रहना दिया जाए.

आरिफ भी उनके साथ था. कमांडेंट बहुत गुस्से में था. ‘जब भी तुम्हें मिलता हैं कोई न कई बहाना बनाकर आ जाते हो. अब यह कह रहे है कि दूसरी बेटी की शादी हैं.

रशीद खान यहां कोई सिस्टम औऱ नियम-कानून हैं की नहीं, जिसे सबको मानना पड़ता है. हम तुम्हें ज्यादा वक्त नहीं दे सकते हैं. दो दिन के अंदर मकान खाली करो नही तो हमें जबरदस्ती करनी पड़ेगी.’

कमांडेंट बड़ा बद्दतमीजी से बोला. आरिफ को यह सब सुनकर बड़ा ही ताज्जुब हो रहा था. यह वहीं आदमी था, जो एक जमाने में अब्बा को अपना भाई मानता कहा करता था.

उसे याद था, कि उस दिन जब इस कमांडेंट पर करप्शन के आरोप लगे थे तो दौड़ा हुआ अब्बा के पास आया था, क्योंकि वह जानता था कि डीजीपी साहब अब्बा पर बहुत विश्वास करते हैं.

उनकी हर बात पर यकीन करते हैं. अब्बा ने आखिरकार हाथ जोड़कर विनती की. ‘एक हफ्ता दे देजिए हूजूर. शादी होने के अगले दिन ही मकान खाली कर दूंगा.’ अब्बा को उस जगह गुजारिश करते देखकर आरिफ का दिल तार-तार हो गया.

अगर मैं लायक होता तो शायद अब्बा को हाथ नहीं जोड़ने पड़ते. ‘नियम तो नियम है’, कमांडेंट ने बड़ी बेरूखी से कहा. अब्बा मायूस होकर लौटने लगे तभी उस कमांडेंट की आवाज आई, रुको अब्दूल रशीद. देखो मैं तीन महिने और देता हूं.

लेकिन कृपा कर के इस बार मकान खाली कर देना. थैंक यू सर, अब्बा ने सिर झुका कर कहा. केबिन से बाहर निकलने के पहले अब्बू ने बार-बार कमांडेंट का शुक्रिया अदा किया.

जैसे ही वे केबिन से बाहर निकले, आरिफ की निगाह कमांडेंट आर.पी सिहं की नेम प्लेट पर पड़ गई. वह लाल और नीली प्लेट थी, जिस पर कमांडेंट के नाम के नीचे आईपीएस लिखा था.

यह बोर्ड पढ़ते ही उसके दिल में एक अजीब खलिश अहसास हुआ. अगर आज आरिफ के नाम के आगे आईपीएस या आईएएस लगा होता तो अब्बा को आज इस तरह गिड़गिड़ाना न पड़ता.

वह हाथों को मलते हुए अपने गुजरे वक्त का अफसोस करने लगा. परेड ग्राउंड में लगभग 50-60 नए रगंरूटो की पासिंग आउट परेड हो रही थी. हजारों बूटों की धमक से धरती कांप रही थी औऱ लेफ्त-राइट-लेफ्त की आवाज हवा में गूंज रही थी.

आसपास के पेड़ो पर पंछियों ने कोलाहल शुरू कर दिया. अब्बा को किसी और आदमी से मिलना था, इसलिए आरिफ अकेला ही अपने फ्लैट की तरफ चल पड़ा।   

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