कविता को हो गया कोरोनावायरस, पढ़ें व्यंग्य का चटखारा

Iraq is also threatened by Iran with Corona virus copy

ऑफिस में मैं कुछ काम कर रहा था, तभी एक श्रीमान जी अचानक आ टपके। वो सारी दुनिया छोड़ फोकट में चाय पीने आए थे, मुझे भी अतिथि के सत्कार की भूमिका में आना पड़ा। तभी वह बोले कि जब तक छाया तब तक तुम एक कविता सुन लो, मेरा सुनाने का बहुत मन हो रहा है।

मैं भौचक्का रह गया। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि इस श्रीमान को कविता पाठ का कौन सा वरदान प्राप्त हुआ है। मेरी समस्या को वह समझ गए, और बोले अच्छी कविता हमेशा हमारे ऊपर आती है, उसे लिखने वाले हम कौन होते हैं। वह समझा नहीं लगी जब अच्छी कविता आती है तो आदमी खिल जाता है, नया ज्ञान देता है।

अचानक मेरे मन में आया कि मुझ जैसे प्राणी को इस कवि ने फंसा लिया है और कितना खिल रहा है, लेकिन मैंने उसके अतिथि होने का भान रखा और कुछ कहा नहीं। श्रीमान जी शृंगार रस के कवि थे, अरुण की कविता ऐसी थी कि उनके कानों में अंगार पिघलने लगते थे।

तभी कुछ समय बाद श्रीमान जी बोले मैं ऐसी वैसी कविता नहीं बल्कि कोरोनावायरस से संबंधित कविता सुनाना चाहता हूं। फिर शुरू हो गए बोलने लगे तुम्हारी आंखों से कल तक बहता था अद्भुत प्रेम रस, लेकिन आज इन निगाहों में दिख रहा है मुझे कोरोना वायरस। इस वायरस के कारण यदि लग गया मुझे रोग प्रेम के जुखाम का, तो तुम ही कहो कि मैं बंचुगा फिर किस काम का। तुम्हारा इंतजार करते-करते मैं सोना चाहता हूं, तुम्हारे प्रेम में मैं कोरोना वायरस होना चाहता हूं।

श्रीमान महोदय ने कविता के बाद फटाफट चाय गटकी और अपना थैला उठाकर चलते बने। उनसे बदला लेने के लिए मैंने भी एक कविता लिखने पर विचार करने लगा था, की कविता का शायद कोरोना वायरस काम कर गया था।

अतुल कनक

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