बीईंग माइंडफुल पत्रिका से… इमारतों में, कला में, साहित्य में और जिंदगी में अनुपात होना चाहिए

From Being Mindful Magazine There should be proportions in buildings, in art, in literature and in life

बीईंग माइंडफुल पत्रिका से…

सत्यमोहन शर्मा, ख्यात कवि, दामोह

“मंडला जिले के बावरिया गाँव में जन्मी इस ‘कला-कूची’ ने दूनियाभर में नाम कमाया. इस महान चित्रकार को इस बात का बोध बहुत पहले हो चुका था कि गुरू ही सबकुछ है, यदि वह राजी नहीं तो कोई भी… ”

समय के रेत पर पड़ते हुए निशान हमेशा बदलते रहते हैं. ये कभी उभरते है तो कभी मिट जाते हैं. मगर ऐसे भी कुछ निशान होते है, जो उस रेत के कण-कण में समा जाते हैं और समय की गाथा उन्हें इतिहास के पन्नों पर अंकित कर लेती हैं.

सुदर्शन व्यक्तित्व और सुधि मनि के धनी सैयद हैदर रज़ा भी ऐसा ही एक अमिट निशान हैं, जो अमिट सौर्दय की रचना से सार्वभौमिक सत्य की खोज में संलग्न रहे.

संभवता 1960 के दशक की बात होगी- ख्व़ाजा अहमद अब्बास ने ‘संगम पत्रिका’ में रज़ा पर एक लेख प्रकाशित किया था कि वह दामोह के हैं. उनके दामोह निवासी होने की बात मन को विस्मय के साथ अजीब से गौरव से भर दिया था.

उस लेख औऱ चित्र को देख कर मेरे भाई ने बताया था, कि रज़ा और उनके भाई यूसुफ, गर्वमेंट हाईस्कूल में उनके समकालीन थे.

मंडला जिले के बावरिया गांव में जन्में रज़ा बताते थे कि बावरिया, ककैया और बचई की प्रकृतिक सुदंरता और जीवन के एक-दूसरे में आबद्ध आंनन्द ने ही उन्हें चित्रकला के प्रति सचेत औऱ आकृष्ट किया.

मुझे एच.डब्लू. लॉन्गफेलो का यह कथन याद आया है कि, “प्रकृतिक ईश्वर का प्रकट रुप हैं और कला मनुष्य का. रज़ा ने जो सबसे पहले स्कैच बनाया था, वह नर्मदा नदी का था.

रज़ा के अन्दर खदबदाती भावनाएँ थी, उनका प्रस्फुटन दमोह आकर हुआ. प्राइमरी और माध्यमिक शिक्षा के दौरान उन्हें जो शिक्षक मिले, उन्होंने रज़ा के जीवन के प्रभाह को न केवल आध्यात्मिक चिन्तन ही दिया वरन चित्रकला के प्रति गंभीरता भी दी.

जब भी वे अपने गुरू जनों की बात करते हैं. चाहे वे नन्दलाल झारिया हो, बेनीप्रसाद हों, दरयाव सिहं राठौर हों या गौरी शकंर लहरी हों- उनकी आँखों में चमक कौध जाती हैं.

मानों उनकी आँखों कहती हों-

‘हरि रुठे गुरु ठौर हैं- गुरू रुठे नहीं ठौर’

वे शायद गुरु-ऋण से स्वयं को मुक्ति करना ही नहीं चाहते औऱ वे कहते है जो उत्साह जीवन के प्रति बारह से सत्रह वर्ष के बीच दोमोह में विकसित हुआ, वह शुद्ध रुप से इन्हीं गुरु जनों के कारण संभव हो पाया.

इन्हीं गुरुओं ने कला, कविता, संस्कृति, सगीत और कला का सुधर्म का मुझे समग्र दर्शन कराया. 14 फरवरी 2007 को जब रज़ा से चौथी बार भेंट हुई तो पिछली तीन मुलाकातों की स्मतियाँ भी तरोताजा हो गई.

सर्वप्रथम उनसे मिलने का सौभाग्य 1976 में मिला था. वे एक लम्बें अंतराल के बाद दमोह आए थे. उनकी फ्रेच पत्नी जनीन मोजिंला उनके साथ थी. उनका भव्य स्वागत औऱ नागरिक अभिनदंन किया गया था.

वे रेलवे स्टेशन से सीधे फुटेरा तलाब गए थे. जहां नन्दी की वह प्रस्तर प्रतिमा स्थापित हैं, जो उनके बचपन से आकर्षण का केन्द्र रही है. दूसरी बार वे फरवरी 1997 में दमोह आए थे. इस बार उनकी पत्नी उनके साथ नहीं थी.

वे शायद अस्वस्थ थी. हाँ जानीन का दिया पश्मीना का शाल उनके साथ था. एक हादसे में वह शाल गुम हो गया था, जिसका उन्हें बेहद दु:ख था, क्योंकि वह शाल जानीन का अत्यन्त प्रिय शाल था.

मैंने उन्हें अपना काव्य संग्रह ‘विकल्प का समीकरण’ भेंट किया तो तत्काल बोले-वाह! यह हुई कोई बात- मुझे ऐसे ही उपहार भाते हैं. 2006 में रज़ा को लेकर ख्यात लेखक-कवि अशोक बाजपेयी मडंला औऱ दमोह प्रवास पर आए थे.

पत्नी जानीन का देहावसान हो चुका था औऱ उम्र का प्रभाव उन पर होने लगा था पर सर्तक और सन्वेष्ट, वे अभी भी थे. दमोह के बारे में जब भी बोलते थे आत्मविभोर हो जाते थे.

साहित्यिक मित्रों ने सम्मान गोष्ठी आयोजित थी. इस अवसर पर उनका भाषण एक आत्मीय बातचीत थी- जैसे परिवार का मुखिया अपने आत्मजनों से बतिया रहा हो.

चौथी बार वे दमोह के प्रतिभावान छात्रों को रज़ा पुरुस्कार सम्मान देने आए थे, जिसके लिए उन्होंने 3 लाख रुपये का रज़ा कोष भी स्थापित किया. इस बार भारतीय परिधान में सजी उनकी सेक्रेटरी सबरीना भी थी.

चेहरे पर चपल मुस्कराहत लाकर उन्होंने कहा भी था कि सबरीना को भारत से प्यार हो गया है. मैं चाहता हुं यह मुझसे प्यार करें. और फिर खिलाखिला कर हँस पड़े थे. इस एक बरस में रज़ा और बूढ़े हुए थे.

पर भले उनके चेहरे पर झुरियां आ रही हो, किन्तु उनके अन्दर एक लगन अब भी उदीप्त थी- उनकी जिजिविषा और कुछ कर गुजरने का मद्दा अभी भी वैसा ही था, जैसा पूर्व के वर्षों में थी.

रज़ा से जब भी बात की तो ऐसा लगा कि वो पीछे छूट गए अतीत को सहजने की कोशिश कर रहे है. छूटे हुए स्थान और लोगों की यादे और उनका आत्मविश्लेषण नदी की निर्मलधारा के सामान अभी भी तटबंधों का स्पर्श करता हुआ प्रवाहमान है.

वे अपने गुरु जनों औऱ हिन्दी कविता के साथ चित्रकला की बात करते है तो स्पष्ट बताते हैं, ‘फ्रास में उस भाषा पर अधिकार करने में मेरी चित्रभाषा ने बड़ी मदद की थी.’

वे यह भी कहते है, ‘इमारतों में, कला में, साहित्य में और जिंन्दगी में अनुपात का बोध होना चाहिए. इस क्षेत्र में फ्रांस अग्रणी हैं. रज़ा जिंन्दगी सुन्दर चीजें तथा रगों से प्यार करते हैं.

वे कहते भी थे की चित्र बनाए नहीं जाते बल्कि बन जाते हैं. उनकी भावना हैं- उन्हें सबसे अधिक प्रेरणा कविता से प्राप्त हुई. उनके डायरी “ढाई आखर” में सारी कविताएं उद्धरण सग्रहित हैं.

लोगो से निकटता और प्राकृति से अभिछिन्न लगाव उनकी रचनात्मकता का सबसे बड़ा कारण था. उनके अतंस में मधुर यादों से संतृप्त विगत और आगत की चिंता के सुदीर्ध समीकरण मौजूद थे.

रज़ा की अभिव्यक्ति बड़ी सहज थी. वे निश्छल मन से अपने आप को व्यक्त करते थे. मेरी मुँह बोली बहन डॉ रमोला हेनरी के यहां हम रात्रि भोज में आमंत्रित थे.

रज़ा ने ड्राइग रुम में कदम रखते ही महिलाओं से मुखातिब होते हुए कहा- भारतीय महिलाएं बड़ी खूबसूरत होती हैं. और उनके परिधानों के रंगो में गजब का आकर्षण होता है.

उनकी पारखी दृष्टि ने दिवारों को भांपकर कहा कि यह पहला मकान है. जिसकी एक दीवार पर एक ही चित्र हैं. तथा चित्र के चौखटों और दिवारों के रंग-संयोजन लाजवाब हैं.

हालांकि बातें बहुत छोटी थी किन्तु उनसे जीवन के प्रति सामीप्य, आसपास की चीजों से जुड़ाव और चित्र वृत्ति के बारे में संज्ञान लिया हैं.

रज़ा के पिता ने उन्हें नमाजी बनाया, ऋषियों जैसे गुरु का सानिध्य बनाया तथा हनुमान मंदिर और रामचरित मानस ने उन्हें हिन्दू धर्म और संस्कारो से रुबरु किया और जनीन से विवाहोपरान्त क्रिश्चियन धर्म मान्यताओं नें उन्हें दीक्षित किया.

रज़ा स्वीकार करते थे, कि धर्म और आस्था तथा आध्यात्मिकता को जो लेकर सार्वभैमिकता का भाव मुझ में है, वह बचपन के इन्हीं अद्धभुत अनुभवों से पनपा है.

पत्नी जनीन के कारण उन्होंने प्रत्येक रविवार को चर्च जाना शुरु किया और यह प्रक्रम जनीन के पाश्चात भा जारी रहा. डॉ रमोला हेनरी के डिनर के बाद वे लगभग आधा घंटा ‘चैपल’ में बैठे और प्रार्थना की थी.

रस्किन का कहना है, “मानव की भावनाओं का प्रबल प्रवाह जब रोके नहीं रुकता तभी यह कला के रुप में फूट पड़ता है.” रज़ा ने यह मूर्तिवत रुप देखा था. उनकी अकृति की भव्यता, उनके व्यक्तित्व की अद्धुदता और उनके व्यवहार का शालीनता का समन्वय ऐसी शुचिता का निर्माण करता हैं, जो आकर्षित ही नहीं समाहित होने का आमंत्रण देती हैं.

आधा शताब्दी से अधिक व्यतीत कर देने और विजातीय से शादी कर लेने के बाद न उन्होंनें धर्म छोड़ा न ही भारतीय नागरिकता. यही वह यह कारण हैं, जो उन्हें संसार भी बाँध न सका और उनकी कला यात्रा में स्मृति और कला में अभी भी सुवासित हैं.

रज़ा के शब्दों में दोहराऊं तो, “कला कर्म एक विचित्र उन्माद हैं. इसे विश्वास से सहेजना हैं, सपूर्णता से, पहाड़ा के धर्य के सामान, मौन प्रतिक्षा में अकेले ही.” सम्रग रुप से रज़ा कैनवास पर अंकित कविता के सामान हैं.

उनको देखना, उनसे मिलना और बातें करना एक अनुष्ठान था, जिनमें शामिल होकर न केवल आत्मिक शांति मिलती हैं, बल्कि वहां आंनन्द भी मिलता हैं. जिसकी प्राप्त आराधना परम का हैं.

रज़ा 94 वर्ष के हो चले थे- वह अभी भी अपना ऱथ जोते हुए थे. महात्मा गाँधी के कथन के अनुरुप वह आपना जीवन चल रहे थे. जिससे उन्हें कभी थकान नहीं आती थी. किन्तु 23 जुलाई 2016 को एक संक्षिप्त बीमारी के उपरान्त उनका देहावसान हो गया.

उनसे 2011 में एक छोटी-सी मुलाकात हुई थी. यह उनकी आखिरी दमोह यात्रा थी. वे विशेष रुप से दामोह में कला, साहित्य औऱ सगींत का एक केन्द्र स्थापित करने की इच्छा रखते थे, लेकिन देश कानूनी मायाजाल और कुछ सर्मथ व्यक्तियों की महत्वाकाछाओं ने ऐसा नहीं होने दिया.

रज़ा की कलाकृतियों को देखकर लगता हैं कि “पेन्टिग एक मूक कविता हैं औऱ कविता एक मुखर पेंटींग हैं.” उनकी साधना औऱ उपलब्धियों के बारे में यही कहा जा सकता है-

‘His paintings are poems on canvas-silent, yet verbose.’

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