युवा वर्ग को तवज्जों न देना, कांग्रेस को पड़ेगा भारी

Do not pay attention to the youth  Congress will get heavy

यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है, कि आज कांग्रेस की जो स्थिति है. वो अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर में पहुंच चुकी है. इससे पहले कांग्रेस कभी इतने कम सीटों में सिमटी नहीं थी.

लेकिन जब से नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने और बीजेपी ने व्यापक स्तर पर संघ के साथ मिलकर राज्य दर राज्य जो जीत हासिल की कांग्रेस को बड़ा झटका लगा.

इससे निकलने के लिए कांग्रेस में आत्ममंथन की जरूरत है. लेकिन 10 जनपथ स्थित कॉन्ग्रेस मुख्यालय में बैठे बुजुर्ग नेता कहीं ना कहीं कांग्रेस को मजबूत करने की जगह पर कमजोर करते जा रहे हैं.

अगर हालिया में देखा जाए तो कांग्रेस के तीन बड़े युवा नेता पहले मध्य प्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजस्थान के सचिन पायलट औऱ नार्थ ईस्ट के हेमंत विश्व शर्मा. यह तीनों कांग्रेस पार्टी के प्रमुख युवा चेहरे थे.

जिन्हें कहीं ना कहीं राहुल गांधी के वजह से आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला. अगर देखा जाए तो मध्य प्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता विरोधी लहर का फायदा तो मिला है. साथ ही वहां पर सरकार भी बना पाई.

लेकिन देखने की बात यह थी, कि क्या यह जीत कांग्रेस को सत्ता विरोध के नाम पर मिला या कांग्रेस के युवाओं के नाम पर. और उनकी कार्यप्रणाली पर सबसे पहले बात करें मध्यप्रदेश की तो 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी.

उसमें एक बड़ा योगदान गुना के तत्कालीन सांसद मध्य प्रदेश की राजनीति व देश की राजनीति में कद्दावर नेता माने जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का था. ज्योतिरादित्य सिंधिया 2001 में कांग्रेस ज्वाइन किए और चुनाव दर चुनाव जीते चले गए.

2018 में मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने सत्ता पाई जोकि एक तरह से सत्ता विरोधी व बीजेपी के कार्यकाल उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के विरोध में वोट मिले. लेकिन कांग्रेस ने युवा वर्ग व राजनीति में नया कीर्तिमान स्थापित करने वाले युवा नेता सिंधिया के जगह पर पुराने कांग्रेसी और राजीव गांधी के करीबी कमलनाथ को मध्य प्रदेश की सत्ता मिली.

जिससे कि युवा वर्ग सिंधिया ने जहर की घूंट पीकर स्वीकार तो कर लिया, लेकिन वो इसकी टिस नहीं भुला पाया और उन्हें सबसे बड़ा झटका 2019 के लोकसभा चुनाव में लगा.

जब वह खुद अपनी गुना से चुनाव हार गए तब उन्होंने यह सोचकर कांग्रेस से बगावत नहीं की कि शायद 2020 में होने वाले राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उन्हें राज्यसभा के द्वारा दिल्ली पहुंचाएं.

इसमें वह कांग्रेस के पुराने नेता राजनीति के दिग्गज खिलाड़ी दिग्विजय सिंह से मार खा गए और कांग्रेस ने फिर यहां पर युवा के जगह पर बुजुर्ग को तरजीह दी. और इसका खामियाजा उसे मध्य प्रदेश में 15 महीने पुरानी बनी सरकार से हाथ धो कर देना पड़ा.

सिंधिया अपने समर्थक विधायकों के साथ भाजपा ज्वाइन कर लिए अब भाजपा ने मौके का फायदा देखते हुए उन्हें राज्यसभा भेज दिया. उनके विधायकों को मंत्री बना कर उनको भरोसे में लिया कि वह कांग्रेस से ज्यादा भाजपा में सम्मानित व शक्तिशाली हैं.

अब बात भारत के पूर्व की करते हैं तो हमें पार्टी के एक और युवा चेहरे रहे हिमंता बिस्वा सरमाकी याद आती है. जिन्होंने कांग्रेस को जो नुकसान पहुंचाया वो ऐतिहासिक है.

हिमंता बिस्वा सरमा कभी दिल्ली में बैठे कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच रखते थे. लेकिन 2015 में उन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया. 1996 से 2015 तक हिमंता बिस्वा कांग्रेस में रहे और असम की कांग्रेस सरकार में मंत्री पद भी संभाला.

कांग्रेस से हिमंता बिस्वा सरमा इतने नाराज हो गए कि उन्होंने बीजेपी में जाने का फैसला कर लिया. उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर उस वक्त गंभीर आरोप भी लगाए.

इसके बाद 2016 असम विधानसभा चुनाव लड़ा और कैबिनेट मंत्री बने. इतना ही नहीं बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने हिमंता बिस्वा सरमा को नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (NEDA) का संयोजक भी बना दिया.

NEDA, नॉर्थ ईस्ट भारत के कई क्षेत्रीय दलों का एक गठबंधन है. नेडा के संयोजक रहते हुए हिमंता बिस्वा सरमा बीजेपी के लिए सबसे बड़े संकटमोचक के तौर पर उभरकर सामने आए.

नॉर्थ ईस्ट की राजनीति में शून्य कही जाने वाली बीजेपी ने असम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर जैसे राज्यों में सरकार बनाकर कांग्रेस का सफाया कर दिया.

इसके अलावा नॉर्थ ईस्ट के अन्य राज्यों की सत्ता में भी बीजेपी का दखल बढ़ गया. हिमंता बिस्वा सरमा ने नॉर्थ ईस्ट की राजनीति में बीजेपी की बढ़त बनाने में अहम भूमिका अदा की.

 

राजस्थान की राजनीति में भूचाल

ताजा उदाहरण सचिन पायलट का है. राजेश पायलट जैसे कांग्रेसी दिग्गज के बेटे सचिन पायलट 26 साल की उम्र में कांग्रेस से सांसद बने तो 35 साल की उम्र में उन्हें केंद्रीय कैबिनेट में जगह दी गई.

इसके बाद 2014 में जब उनकी उम्र 37 साल थी तो पार्टी ने राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कमान उनके हाथों में सौंप दी. सचिन पायलट ने जी-तोड़ मेहनत की. पूरे प्रदेश में घूमकर तत्कालीन वसुंधरा राजे सरकार को एक्सपोज किया और अपने संगठन को मजबूती से आगे बढ़ाया.

ये वो वक्त था जब अशोक गहलोत दिल्ली में राहुल गांधी के साथ देश की राजनीतिक बागडोर संभाले हुए थे. सचिन पायलट की मेहनत रंग लाई और 2018 में राजस्थान की जनता ने वसुंधरा सरकार उखाड़ फेंकी और कांग्रेस को सत्ता सौंप दी.

जब जीत का सेहरा बंधने का नंबर आया तो अशोक गहलोत का तजुर्बा और प्रदेश व पार्टी में उनकी पकड़ सचिन पायलट की पांच साल की मेहनत पर भारी पड़ गई.

तमाम खींचतान के बाद सचिन पायलट उपमुख्यमंत्री पद पर राजी हुए, लेकिन दोनों में तालमेल नहीं बैठ पाया. अब बात यहां तक पहुंच गई है कि सचिन पायलट बगावत पर उतर आए हैं और गहलोत सरकार संकट में आ गई है.

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है, कि जिस कांग्रेस में युवा वर्ग के नाम से मशहूर चंद्रशेखर ने कांग्रेस के तोड़ने की बात की: उसे नहीं कर पाए.

लेकिन आज भले ही ये युवा नेता कांग्रेस को तोड़ नहीं पाए. लेकिन उन्होंने कांग्रेस की चूल्हे हिला कर रख दी और जिन राज्यों के ये कद्दावर नेता थे और इनकी वजह से सरकारे बनी थी.

वहां पर कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी है और अब कांग्रेस पुराने जैसे मजबूत स्थिति में ना पहुंचे और कांग्रेस अभी नहीं समझी और केवल बुजुर्गों के अनुभव पर कार्य करती रही.

वह दिन दूर नहीं जब कांग्रेस के टिकट पर एक सांसद सदन न पहुंचे कांग्रेस को अब यह समझना होगा,  कि राजनीति भी समय के साथ बदल गई है, करने वाले भी अब बदल गए हैं. इसलिए कांग्रेस को अब अनुभव की जगह पर मेहनत का फल देने का काम करना चाहिए और युवाओं को आगे बढ़ाना चाहिए.

लेखक- युवा पत्रकार प्रशांत तिवारी, गाजीपुर 

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