बोध को ऐसे समझें: क्या हम अपने आप में है? क्या खुद को पहचाना हैं?

Are we in ourselves? Have you identified yourself?

विनयश्री दुबे, इंदौर

बोध, शब्द का ही बोध हो तो बहुत है, यह तो अपना बोध होने की बात है. कैसे हो? कहां हो? हो भी जाएगा तो क्या होगा? क्यों हो? इतने सारे प्रश्न…अंतहीन, क्योंकि यह अंतर में घटने का मामला है.

यह भी आवश्यक नहीं हैं कि हर जीव का बोध सामान हो न ही डीएनए जैसा मामला है. बोध क्या हो, यह भी बहुत ही अलग विषय है.

आप सोच सकते हैं, अलग विषय कैसे हो मानो किसी व्यक्ति को संख्या ‘1’ को समझना है तो वह सभी की समझ के अनुसार एक ही होगा, लेकिन यह संख्या या कोई भी अन्य तथ्य जानकारी हैं, वह बोध के स्तर पर अलग तरह से खदबदाती है.

ज्ञान व बोध एक-दूसरे के पर्यायवाची लगते हैं. किन्तु यथार्थ में दोनों ही एक-दूसरे से भिन्न हैं. जीवन के आसपास से अनुभव ग्रहण करके उनके अनुसार खुद को बनाना, जैसे उदाहरण के लिए कार या स्कूटर तेज चलाने से कुछ गलत हो सकता हैं. तो यह बोध नहीं ज्ञान की श्रेणी में आता हैं.

ज्ञान वह सभी कुछ है जिसके द्वारा हमारे जीवन में सीखे हुए तथ्यों व विचारों का प्रवेश होता हैं. हम वहीं करते हैं, जैसा हमें बताया गया है… ‘लेफ्त चलो’. हम प्रयोग नहीं कर सकते.

ट्रैफिक के स्तर पर या भौतिक स्तर पर तो कभी नहीं, वरन नियम टूट जाए. अब चर्चा करते हैं बोध की, जो ज्ञान से बिल्कुल अलग संदर्भ हैं. यह सभी बता देगें कि बोध वह है, जो बुद्ध को हुआ था. … लेकिन हम बुद्ध तो है नहीं, तो हमें इसका कैसे भान होगा.

ऐसा कौन-सा रास्ता है, जो बोध के रास्ते को सुगम बनाता हो, उस पहेली के वृत तोड़ता हो, जो बहुत जटिल है. सवाल उठ सकता है कि बोध तक पहँचना जटिल हैं?

विद्वानों की राय इसमें अलग हो सकती है, लेकिन यह बात संस्कार की है. आपके संस्कारों का स्तर क्या है? घरो में जो बहुओं को संस्कार के नाम पर ताना मारा जाता है, वह संस्कार है ही नहीं.

संस्कार का संसार अलग ही है. हर व्यक्ति में भिन्न. लेकिन बोध के स्तर तक जाने के लिए इसे थिथिल करना बेहद आवश्यक हैं. पर आप उसे कैसे थिथिल करोगे. कितना भी पानी डालो, यह थिथिल नहीं होंने वाले.

इतना ही बोध नहीं है कि संस्कार हैं क्या? तो फिर थिथिल करने की बात दूर है. भगवान कृष्ण गीता के सातवें अध्याय में कहते है-

दैवी ह्योषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।

मामेव ये प्रपघन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।

जिसका अर्थ है भगवान की असंख्य दिव्य शक्तियाँ हैं. पर माया के साथ रहने पर यह पराशक्ति ढक सी गई हैं. अब सवाल उठता है कि माया क्या हैं? मानव इसी में उलझा है. वह माया को धन मानता है, वह उसका एक रूप मात्र है. यदि बोध विषय पर फिर से गौर करे तो शरीर के लिए माया समझना बहुत आसान हैं. भगवान ने हमें कितनी माया से बनाया है. इसे ऐसे समझें-

  1. क्या त्वचा आवश्यतक हैं? आप कहेंगे अवश्य, इसके बिना सुदंरता कैसी? यह सबसे बड़ी माया है- अन्नमय कोष- यह हमारी पहचान के रूप में लोगों दिख रहा हैं- हमारा रंग, रूप, कद-काठी आदि.
  2. त्वचा के पीछे क्या है? आप कहेंगे मांसपेशियाँ, तो क्या हम माँसपेशियाँ मात्र है? आप कहेंगे नहीं, तो फिर यह दूसरी माया- प्राण से बनी- प्राणमय कोष
  3. आँखें, कान, जिह्वा, जो मन को तैयार कर रहीं हैं, आमरस खा लो, यह जींस ले लो, वह गहना खरीद लो, मनोमय कोष.
  4. शरीर को जो सहज ज्ञान हो रहा है, कैसे गाड़ी चलाना है, कैसे नही, शरीर का ज्ञान औऱ तमाम ज्ञान विज्ञानमय कोष.
  5. अंत में मनुष्य किस अवस्था यानि कपड़े, गाड़ी-बगला नहीं, मूल रूप से वह कितना आन्नद में है. यह प्रसन्नता किसी की ठिठोली या मजाक बनाकर नहीं हैं, यहां आंनद आत्मा का स्वभाव है.

यह किसी के ऊपर अपनी श्रेष्ठता थोपने का नाम भी नहीं हैं. यदि कोई व्यक्ति आंनद करते हुए काम कर रहा है, गाना गाते हुए काम कर रहा है, चुटकियाँ बजाते हुए तल्लीन हो रहा है. तो उसका ‘विभोर ठिकाना’ हैं, उसका आत्मतत्व।

मजे की बात यह है कि इसे कोई छीन नहीं सकता. यह व्यक्ति की निजि संम्पत्ति है. बात फिर से बोध की, जो संस्कार पर अटकी थी. लेकिन अलग-अलग संस्कार होने पर किसी का प्राप्तव्य जल्दी है, किसी का देर से.

जैसे गुरूनानक गिनती गिनते हुए, ‘उसकी’ लय में खो गए, गले का कैंसर होने के बाद भी खून की उल्टी करते हुए भी परमहंस काली-काली करते हुए नृत्य करते थे.

ऐसा क्यों, तो संस्कार पुराने जीवन के कर्मों के कारण आत्मा के साथ पोंटली बाँधकर आए हैं. तो आप पूछ सकते है कि मैं ऐसा स्वांग क्यों करूं तो क्या मैं बोध को प्राप्त कर सकता हूं, तो जबाव है ऐसा भी नहीं हैं.

इसलिए श्रीकृष्ण भगवान कहते है कि मेरा माया बहुत कठिन हैं- जब पांच परतें पूरी करके व्यक्ति अपने पास आता है, तो ज्ञानेंद्रियों के पांच पाश और कर्मेंद्रियों के पांच वृत्त घेर लेते है, इसे पार करते हैं तो चित्त जकड़ लेते हैं.

चित्त में चार चीजें हैं, मन, बुद्धि, अहंकार और संस्कार. इन चारों का थिथिलीकरण या तो गुरू करें या अभ्यास या जप. आप पूछेंगे कि अभ्यास तो क्या योगाभ्यास करें, पर जरुरी नहीं कि योग से प्राप्त हो जाए. परंतु करते-करते आपको पराशक्ति यहां तक ले जाती हैं, तब भीतर सब खाली हो जाता हैं, इतना अधिक प्रकाश होता हैं कि आप सहसा विश्वास न करें कि यह मेरा ही शरीर हैं, या ब्रम्हांड का कोई ऊर्जा पुंज हैं.

दृष्टा यानि जो इन बातों का ध्यान कर रहा हैं, वह अपने स्वरुप में अवस्थित हो जाता है, यानि प्रकाश में उसका सर्वस्व रूक जाता हैं. इसलिए महर्षि पंतजलि योग दर्शन के पहले अध्याय समाधिपाद के तीसरे सूत्र में कहते हैं-

तदा द्रष्टु: स्वरुपेवस्थाम्।।

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