अमृतलाल सागर का व्यंग्य (भाग 2): जब बात बनाए न बनी

Amritlal Sagar's satire (Part 2): When talk is not made

अमृतलाल सागर

प्रसिद्ध साहित्कार (1916-1990)

भाग 1 का शेष…

हमने घबराकर कर चटपट उत्तर दिया, “बारहा कहा कि मेरी मजाल नहीं जो अपमान कर सकूं. और अगर आपको लगा हो कि मैंने अपमान किया है तो लिखित क्षमा मांग लूंगा, मगर हाथ आया घर न छोड़ूगा. आपका जी चाहे तो हंसकर या गाली देकर साला कह सकते हैं. मैं दोनों स्थितियों में अहिंसावादी बना  रहूंगा.”

वह गरमा उठे, “आप हम पर अपना साम्राज्यवाद लादना चाहते हैं. हमारे प्रदेश, हमारे नगर में आकर हमारें मकानों पर कब्जा करना चाहते हैं.? ऑल राइट, विल सी यू।”

हमनें कोई ध्यान नहीं दिया. भारत के लोग पहले-पहल इसी तरह पेश आते हैं औऱ बाद में हिल-मिल कर एक हो जाते हैं. खैर साहब, उस घर में हम रहने लगे. हम ब़ड़ी शराफत से रहने लगे. गृहस्थी के लिए आवश्यक औऱ उचित चीजें लाने के साथ-साथ हम गणेश और बजरंगबली के चित्र भी ले आए.

घंटी, दिपक, माला, स्त्रोंतों की पोथी, धूपबत्ती आदि भी लाकर सजा ली, तकि लोग हमें भला मनुष्य समझें. ऊपर-नीचे, पास-पड़ोस में आते-जाते नमस्कार करके अपना-उनका परिचय लिया-दिया.

चार-पांच दिनों में ही उनके साथ सवेरे-शाम राजनीति, जमाने औऱ अखबारी समाचारों पर बहसें होने लगीं, बस एक वहीं साहब हमसे सीधा रूख न मिलाते थे, जिनका साला पड़ोसी न बन सका था.

हमने उनकी चिंता छोड़ी, एक के नाराज होने से क्या बिगड़ता हैं? हमने साले वाली बात औरो को बता दी. मगर एक पखवाड़ा भी नहीं बीता था कि हम अनुभव करने लगे, लोग-बाग हमसे कतराते हैं.

अब नमस्कारों में मुस्कान का चमत्कार न हीं रहा. ‘वेल सर, हाऊ आर यू’ का शिगूफा भी बन्द हो गया. पड़ोसियों के बच्चें-बच्चियां भी हमसे, यानि अपने नए ‘अकंल जी’ से टॉफी मांगने न आते.

हम घबराए आखिर माजरा क्या हैं.? कुछ ही दिनों में हम एकदम अकेले पड़ गए. यानि लोगो ने नमस्कार का जवाब किसी हद तक देना बंद कर दिया. हमने सोचा अवश्य ही कोई चाल हैं. पर क्या चाल हैं, यह पता नहीं चलता था. खैर, समूह में दो-एक नरम दिल के लोग भी होते हैं,

हमने एक पड़ोसी को बाहर ही पकड़ा. प्रेम से ले जाकर रेश्तरां में कॉफी पिलाई. मालूम हुआ हमको उस चाल में रहने वाले सरकारी बाबुओं के पोलिटिकल विचारों की जासूसी करने के लिए खास नई दिल्ली से भेजा गया हुं.

हमने इसकी फौरन ही काट शुरू की, मगर जासूस का डर पक्का बैठ गया था, बात हाथ से निकल चुकी थी. हमारी सफाई से पड़ोसियों का सदेंह औऱ बढ़ गया. चार दिन बाद हमारे कमरे के पिछवाड़े वाले दरवाजे के पास एक मुर्गियों की ढाबली दिखाई पड़ने लगी.

हम डरे कि जाने किसकी हो, खामोश रहें. मगर एक दिन शाम को जब घर आए तो सारी स्त्रियां अपनी भाषा में गरमा-गरम शब्द छौंकती मेरे ऊपर टूट पड़ी. हमने बहुत समझाया कि हमने मुर्गी-पालन कार्य कभी नहीं किया, हम घोर वैष्णव हैं, प्याज-लहसुन तक नहीं खाते, मगर कौन सुनता हैं.?

हमने लिखकर दिया कि मुर्गियां हमारी नहीं हैं. उसके बाद से हम सबकी नजरों में खटकता खार हो गए. इसके बाद एक ही सप्ताह बीता था कि एक दिन सुबह सिपाही के साथ साले साहेब को लेकर बहनोई साहब आ धमके.

दरवाजा खटखटाया औऱ हमारे कुंडी खोलते ही सब लोग अंदर घुस आए. बिना पूछे-ताछे धड़ाधड़ हमारा सामान फेंका जाने लगा. हमने पूछा-“ये क्या माजरा हैं.?” बताया गया कि जिसके नाम वैधानिक रुप से मकान अलॉट हुआ, वह रहने आया हैं.

हमने कहा कि घर तो हमारे नाम अलॉट हैं. उन्होंने नाम पूछा, हमने नाम बतलाया. वह बोले कि इस नाम का किराएदार तो परसों इसी घर में हार्टफेल से मर गया. सब लोगों की गवाही हैं. हम कोई ऐरै-गैरे हैं, जो कल जबरदस्ती इस घर में घुस आए हैं. आप समझ सकते हैं कि हम पर क्या गुजरी होगी.

यानि अब तक जिंदा थे, जबकि परसों मर चुके हैं. हम, हम न थे ब्लकि ऐरे-गैरे थे. हमारा सामान सड़क पर गया औऱ घर साले का हो गया. हमारे बनाए कोई बात न बनी. फिर से खूद को जिवित साबित करने में ही सारा दिन लग गया.

अमृतलाल सागर का व्यंग्य (भाग1): जब बात बनाए न बनी

 

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