अमृतलाल सागर का व्यंग्य (भाग1): जब बात बनाए न बनी

Amritlal Sagar's satire (Part 1): When talk is not made

अमृतलाल सागर

प्रसिद्ध साहित्कार (1916-1990)

बड़े-बूढ़े झूठ नहीं कह गए हैं कि परदेश जाएं तो ऐसे चौकन्नें रहें, जैसे बुढ़ापे में ब्याह करने वाला अपनी जवान जोरू से रहता हैं. हम चौकन्नेपन क्या, दसकन्नेपन की सिफारिश करते हैं, वरना ईश्वर न करें किसी पर ऐसी बात बीते, जैसे परदेस में हम पर बीती.

हम साढ़े पांच हाथ के जीते-जागते मौजूद रहे औऱ परदेस ने हमारे मुंह पर कानूनी तमाचा मारकर कुछ देर के लिए यह साबित कर दिया कि हम मर गए हैं.

शहर का नाम न पूछिएगा, गई-गुजरी के बात के लिए किसी को बदनाम करना हमारी नीयत नहीं. हां, इतना जान लेना ही आपके लिए काफी होगा कि वह नगरी दूसरे भाषा बोलने वालों के प्रदेश में है और हम पापी पेट के वास्ते वहां रहने गए थे. मकानों की समस्या के विषय में आप सब जानते ही हैं, हमें भी बड़ी किल्लत का सामना करना पड़ा.

होटल सस्ता होकर भी बड़ा महंगा था. दाम भरपूर और प्रबंध का यह हाल था कि सुबह की चाय दस तकाजों के बाद दोपहर में मिलती थी, और दोपहर का खाना अगर आज मांगा गया हैं, तो परसों शाम को अवश्य पहुंच जाएगा. खैर, बड़ी दौर-धूप की, दफ्तर कुर्सियों की मिन्नत-खुशामद की औऱ तकदीर ऐसी सिकंदर सिद्ध हुई कि चार महिनें बाद ही एक मकान हमारे लिए अलॉट हो गया. हम बड़े प्रसन्न हुए, मकान देखने गए.

एक छोटी सी चाल थी, अर्थात उस नई बनी हुई इमारत में एक-एक कमरें वाले बीस घर थे. हम अपने कार्यालय के एक सहयोगी को लेकर उस जगह को देखने गए थे औऱ जब देख ही रहे थे कि एक सज्जन, गोदी में अपने मुनुआं को लेकर बड़ी अकड़ के साथ दाखिल हुए औऱ अपनी भाषा में कुछ पूछा.

हम तो खैर नए थे, लेकिन हमारे सहयोंगी ने बात को समझकर कर अंग्रेजी में उत्तर दिया. धड़ाधड़ा बात होने लगी.

उन्होंने पूछा- “आप इस घर को ले रहे हैं?”

उसने कहा- “जी हां।”

वह बोले- “लेकिन मैं आपको चेतावनी देता हूं कि इस घर में न आएगा।”

“क्यों साहब? क्या इस घर में भूत रहते है?”

“भूत़!” उन्होंनें चौंककर शब्द दुहराया, फिर बोले- “जी नहीं। यहां हम लोग रहते है।”

“तो क्या फिर चोर-उच्चकों की बस्ती है?” हमारे इस प्रश्न से वह लाल-भभूका हो गए, कहा, “आप हमारा अपमान करते हैं. यहां सब शरीफ लोग रहते हैं.”

हम विन्रम हो गए, दीनता से कहा, “यहीं सोचकर तो हम भी आ रहे हैं, परदेस में शरीफों का साथ ही ठीक रहता है।”

“लेकिन आप नहीं आ सकते हैं. यहां सब घर-गृहस्थी वाले लोग ही रहते है.” उन्होंने कहा.

“हम भी घर-गिरस्ती वाले ही हैं.”

“लेकिन आप परदेसी हैं. हमारे यहां कोई परदेसी नहीं रह सकता. यह घर मैं अपने साले के लिए अलॉट करवाना चाहता था, लेकिन वेटिंग लिस्ट में उसका नाम दूसरे नबंर पर हो गया हैं और आपका पहले नबंर पर. आप यदि अपनी टांग छोड़ दे, तो यह घर मेरे सालों को मिल जाएगा.”

हमने उसको समझाया, देखिए सारी दुनिया को पड़ोस में बसाए, मगर साले-ससुरे से सात कोस दूर रहना ही आपकी गृहस्थी के लिए शुभ होगा.” वह गरमा गए, कहा, ”आप मेरे साले की इसंल्ट करते हैं.”

(शेष अगले भाग में)

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