होता यह है हम जो देखते हैं वैसा होता नहीं है, अंदर का मामला कुछ दूसरा ही होता है

SABKIAWAZ

 

साल 2019 अपने अंतिम चरणों में विदा लेने की तैयारी में है. यह साल हम लोगों के जीवन में काफी परिवर्तनशील रहे होगे, कुछ बिछड़े भी होंगे और कुछ नए भी बने होंगे. बनने और बिगड़ने की प्रक्रिया प्राकृतिक के देन है; इसमें तो हम कुछ कर नहीं सकते. लेकिन 365 दिनों के 1 साल में कुछ ऐसी घटनाएं हो जाती हैं, जो पूरे जीवन भर यूं ही साथ चलती रहती है. कुछ मेरे भी किस्से जो भूले बुलाए नहीं भूलते है.

वास्तविकता का सच
होता यह है हम जो देखते हैं वैसा होता नहीं है, अंदर का मामला कुछ दूसरा ही होता है. पत्रकारिता पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं? मामला ये है! हम लखनऊ को जानने के लिए इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, घंटाघर को घूमने के लिए निकले थे. इमामबाड़ा से थोड़ा आगे बढ़ने पर चौक है, वही केजीएमयू हॉस्पिटल के गेट नंबर 8 पर पोस्टमार्टम हाउस भी है. उसी दिन शहर में एक बहुत बड़ा रेप कांड के साथ मर्डर हो गया था, प्रशासन के हाथ पांव फूले हुए थे; धार्मिक संगठनों में रोष था; चाय की तफरी पर बैठा एक अखबार का संवाददाता चाय वाले से सुबह से हो रही हलचल का पता ले रहा था. पीड़ित परिवार इतना गरीब था की उसके पास लाश ले जाने के लिए पैसे नहीं थे. लेकिन वहां पर मौजूद धार्मिक संगठनों, प्रशासन, पत्रकारिता इन सभी को इसकी कानो कान खबर नहीं थी.

निराशा नहीं
जून-जुलाई के महीने में ऐसे दो व्यक्तियो से मिलना हुआ, जो थे महान; लेकिन मन से शैतान. एक महानुभाव ने कहा-विकास तुमने शेर के मुंह में हाथ डाला है. मैंने उनकी इस प्रक्रिया को मुस्कुराते हुए टाल दिया. और मन में कहा शेर की जिह्वा पकड़ लेंगे. कुल मिलाकर मामला यह था कि उनसे कार्य हुआ नहीं था. और मुझसे उस कार्य के होने की आशा भी नहीं करते थे. और ना ही उससे कार्य को करने देना चाहते थे. वह कार्य पूरा हुआ नहीं है, लेकिन हम कोशिश ही ना करें तो यह गलत बात है. दूसरे महान- के बारे में बता दो- जो बातें बहुत ही हवा-हवाई करते हैं. परंतु अपनी से आगे बढ़ने में वह अपने बाप का भी सहयोग नहीं करते है. उनकी महानता को मैं देखकर दंग रह गया. मन में निराशा आई. लेकिन निराशा को अगले 24 घंटे के अंदर खत्म कर दिया. फिर अपनी कोशिश में लग गए. किसी कवि ने ये लाइन कहीं है-

मंजिल मिले या ना मिले, यह तो किस्मत की बात है. लेकिन हम कोशिश ही ना करें तो यह गलत बात है.

भरोसा ही धोखा है.
आदतन तुम ने कर दिए वादे 
आदतन हम ने ए’तिबार किया 

गुलज़ार साहब ने बहुत ही सही लिखा है. बीते दिनों मुझे भरोसे पर एक बहुत बड़ा झटका मिला है. लेकिन इस झटके को गुलजार साहब की तरह हमने ए’तिबार कर लिया है. लोग जब अपनी बातों की अहमियत गवा देते हैं, तब उनका इस पृथ्वी के क्षितिज पर रहना ही क्षीण हो जाता है. हालात ये हो जाते हैं कि उनसे अपने ही भरोसा नहीं करते है. उनके रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं. मुझे लगता है लोगों को अपने ऊपर सबसे ज्यादा भरोसा करना चाहिए. क्योंकि दूसरों का कुछ पता नहीं है. हालांकि भरोसे के नुकसान होने से बच गया. लेकिन सबक जिंदगी भर का मिल गया. सबक ये है कि मनुष्य को अपने कार्यों की जवाबदेही स्वयं देने के लिए तैयार रहना चाहिए. किसी पर निर्भरता होने के बावजूद भी. यही जीवन का मर्म है.

हाथ लगी सदी की अमर रचना
कथरी तोहार गुन ऊ जनै,
जै करै गुजारा कथरी मा.
मेरा जन्म अवधी क्षेत्र में हुआ, मुझे हमेशा अपनी रीजनल लैंग्वेज से बहुत ही प्यार है. परंतु कभी यह मौका नहीं मिला कि हम अवधी को पढ़ें और समझें. शायरी हमारी उदासीनता रही होगी, की हमारी बोलचाल की भाषा अवधी होने के बावजूद हमें इस भाषा काव्य धारा से रूबरू होने का मौका नहीं मिला. हमारे परम आदरणीय मार्गदर्शक आबिद रजा सर जी ने अवधी की एक ऐसी रचना से मेरा परिचय कराया है. जिसे सुनने का मन बारंबार कर रहा है. इसके लिए मैं सर का आभार प्रकट करता हूं. ऊपर दी गई लाइने अवधी भाषा के रसखान कहे जाने वाले जुमई खान जी ने लिखा है. जो मैं ये कह सकता हूं, की इस साल की सबसे प्रिय गीत है ये मेरा. शहरयार के इस शायरी से आपसे विदा लेते हैं.

सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का,

यही तो वक़्त है सूरज तेरे निकलने का !! –

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